इस अथाह ब्रह्मांड में अनेक ग्रहों व उपग्रहों पर काफी अनुसन्धान हो चुका है और हो रहा है। लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान की गुथी अभी तक नही सुलझ पाई थी।
विश्व के सभी देशो में अलग अलग धर्मो के अनुसार भक्ति विधि से इष्ट की पूजा करते है । लेकिन उससे उनको कोई लाभ व हानि नही होती हैं।
भारत को अध्यात्म ज्ञान का केंद्र माना जाता हैं यहाँ पर अनेक धर्मो के लोग निवास करते है लेकिन यह कहना सही नही हैं कि सभी लोग जिन इष्ट की पूजा करते हैं वह सही हैं या नही । क्योकि पूजा की विधि वही सही हैं जो हमारे वेद व सभी सद्ग्रन्थ प्रमाणित करते है। वेद व सदग्रन्थों के अनुसार संसार मे कहि भी सास्त्र अनुकूल भक्ति नही हैं।
आज संसार चाहे कितनी भी विकशित हो सकता हैं लेकिन बिना आध्यात्मिक ज्ञान के सब कुछ बेकार हैं।
क्या किसी भी भगवान की पूजा से लाभ सम्भव है?
यह बिल्कुल गलत हैं , किसी भी देवता या देवी की भक्ति / पूजा से लाभ सम्भव मिलना सम्भव नही हैं।
Spiritual knowledge with proof in over all holly book
मनमानी भक्ति साधना अंध श्रद्धा भक्ति हैं
अंध श्रद्धा का अर्थ है बिना विचार-विवेक के किसी भी प्रभु में आस्था
करके उसे प्राप्ति की तड़फ में पूजा में लीन हो जाना। फिर अपनी साधना से
हटकर शास्त्र प्रमाणित भक्ति को भी स्वीकार न करना। दूसरे शब्दों में प्रभु भक्ति
में अंधविश्वास को ही आधार मानना। जो ज्ञान शास्त्रों के अनुसार नहीं होता,
उसको सुन-सुनाकर उसी के आधार से साधना करते रहना। वह साधना जो
शास्त्रों के विपरीत है, बहुत हानिकारक है। अनमोल मानव जीवन नष्ट हो जाता
है। जो साधना शास्त्रों में प्रमाणित नहीं है, उसे करना तो ऐसा है जैसे आत्महत्या
कर ली हो। आत्म हत्या करना महापाप है। इसमें अनमोल मानव जीवन नष्ट हो
जाता है।
इसी प्रकार शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाना आचरण करना यानि
अज्ञान अंधकार के कारण अंध श्रद्धा के आधार से भक्ति करने वाले का अनमोल
मानव (स्त्री-पुरूष का) जीवन नष्ट हो जाता है क्योंकि पवित्र श्रीमद्भगवत गीता
अध्याय 16 श्लोक 23 में बताया है कि :-
जो साधक शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण
करता है यानि किसी को देखकर या किसी के कहने से भक्ति साधना करता है।
तो उसको न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न कोई सिद्धि यानि भक्ति की शक्ति
प्राप्त होती है, न उसकी गति होती है। (गीता अध्याय 16 श्लोक 23)
इन्हीं तीन लाभों के लिए साधक साधना करता है जो मनमानी शास्त्र
विरूद्ध साधना से नहीं मिलते। इसलिए अंध श्रद्धा को त्यागकर अपने शास्त्रों में
वर्णित भक्ति करो।
गीता अध्याय 16 श्लोक 24 :- इसमें स्पष्ट किया है कि "इससे तेरे लिए
अर्जुन! कर्तव्य यानि जो भक्ति क्रियाएँ करनी चाहिए तथा अकर्तव्य यानि जो
भक्ति क्रियाएँ नहीं करनी चाहिए, की व्यवस्था में शास्त्रों में वर्णित भक्ति क्रियाएँ
ही प्रमाण है यानि शास्त्रों में बताई साधना कर। जो शास्त्र विपरीत साधना कर
रहे हो, उसे तुरंत त्याग दो।"
| इस पुस्तक में आप जी को कर्तव्य यानि जो साधना करनी चाहिए और
जो अकर्तव्य है यानि त्यागनी चाहिए, सब विस्तार से शास्त्रों से प्रमाणों सहित
पढ़ने को मिलेंगी। अपने पवित्र धर्मग्रन्थों के प्रमाणों को इस पुस्तक में पढ़े और
फिर शास्त्रों से मेल करें। आँखों देखकर तुरंत शास्त्र विरूद्ध साधना त्यागकर
शास्त्रविधि अनुसार साधना मेरे (लेखक के) पास आकर प्राप्त करें।
| आप जी को स्पष्ट कर दें कि वर्तमान में पूरे विश्व में मेरे (रामपाल दास
के) अतिरिक्त शास्त्रों के अनुसार सम्पूर्ण अध्यात्म ज्ञान तथा सम्पूर्ण भक्ति विधि
किसी के पास नहीं है। यह आप जी को इस पवित्र पुस्तक "अंध श्रद्धा भक्ति
दो शब्द
अपने पूज्य ईष्ट देव के प्रति दढ़ प्रेम श्रद्धा कहलाता है। अपने ईष्ट में श्रद्धा
किस कारण से होती है? उत्तर यह है कि मानव (स्त्री-पुरूष) को पता चलता है कि
परमात्मा सर्व सुख प्रदान करता है। संकट के समय श्रद्धालु की रक्षा करता है।
मनोकामनाएं पूर्ण करता है। रोगी को स्वस्थ करता है। परमात्मा भक्त/भक्तमति
की आयु भी वद्धि कर देता है। दुर्घटना से रक्षा करता है। निर्धन को धन, अंधे को
आँखें, बांझ को संतान परमात्मा देता है।
श्रद्धालु का उद्देश्य परमात्मा की भक्ति करके उपरोक्त लाभ प्राप्ति का होता
है। श्रद्धालु अपने धर्म के शास्त्रों को सत्य मानता है। यह भी मानता है कि हमारे
धर्मगुरू हमें जो साधना जिस भी ईष्ट देव की करने को कह रहे हैं, वे साधना
शास्त्रों से ही बता रहे हैं क्योंकि गुरू जी रह-रहकर कभी गीता को आधार बताकर,
कभी शिव पुराण, विष्णु पुराण, देवी पुराण, कभी-कभी चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद तथा अथर्ववेद) में से किसी एक या दो वेदों का हवाला देकर अपने द्वारा
बताई भक्ति विधि को शास्त्रोक्त सिद्ध करते हैं। श्रद्धालुओं को पूर्ण विश्वास होता
है कि जो साधना अपने धर्म के व्यक्ति (स्त्री-पुरूष) कर रहे हैं, यह सत्य है। जब
बच्चा (लड़का-लड़की) समझ रखने योग्य बड़ा होता है तो वह अपने धर्म के
व्यक्तियों को जैसी भी भक्ति-साधना करते देखता है, वह निसंशय होता है कि ये
सब वर्षों से करते आ रहे हैं, यह साधना सत्य है। वह भी उसी पूजा-पाठ को करने
लग जाता है। आयु बीत जाती है।
अंध श्रद्धा भक्ति :- एक-दूसरे को देखकर की जा रही भक्ति यदि शास्त्रोक्त
नहीं है तो वह अंध विश्वास यानि अंध श्रद्धा भक्ति मानी जाती है।
* यहाँ पर यह भी बताना अनिवार्य समझता हूँ कि कुछ व्यक्तियों ने मेरे विषय
में भ्रम फैला रखा है कि ये देवी-देवताओं की भक्ति छुड़वाता है। यह बिल्कुल गलत
है। मैं सर्व देवताओं की शास्त्रोक्त साधना करने की राय देता हूँ जिससे साधक को
यथार्थ लाभ मिलता है तथा पूर्ण परमात्मा को ईष्ट रूप में पूजा करने की राय देता
हूँ जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। वर्तमान जीवन में भी अनेकों लाभ होते हैं जो
परमात्मा से अपेक्षा की जाती है।
| धार्मिक भावनाओं को ठेस :- यदि कोई सज्जन पुरूष (स्त्री-पुरूष) उस अंध
श्रद्धालु को कहे कि आप जिस देवी-देवता को ईष्ट मानकर जो साधना कर रहे हो,
यह गलत है। इससे आपको कोई लाभ नहीं मिलेगा। आपका मानव जीवन नष्ट हो
जाएगा। आप देवी-देवताओं की पूजा ईष्ट मानकर ना करो। आप मूर्ति की पूजा
ना करो। आप धामों तथा तीर्थों पर मोक्ष उद्देश्य से ना जाओ। आप श्राद्ध न करो,
पिण्डदान ना करो। तेरहवीं, सतरह क्रिया या अरिथयाँ उठाकर गति कराने के
लिए मत ले जाओ। आप व्रत न रखो। इसके स्थान पर अन्न-जल करने में संयम
करो, न अधिक खाओ, न बिल्कुल भूखे रहो। आप अपने धर्म के शास्त्रों में बताए
दो शब्द
भक्ति मार्ग के अनुसार साधना करो।
| वह अंध श्रद्धावान यदि उस सज्जन पुरूष से कहे कि आप अच्छे व्यक्ति
नहीं हो। आप ने हमारी धार्मिक भावनाएं आहत की हैं। चला जा यहाँ से, वरना
वर्तमान में सही भक्ति बताने वाले सन्त कौन है ?
इस समय कलयुग के बिचली पीढ़ी चल रही है यानी कलयुग का बीच का समय चल रहा है ।
कबीर सागर में एक बहुत बड़ा तथ्य लिखा हुआ है जो बिलकुल सठीक है की जब कलयुग की बिचली पीढ़ी आएगी तब एक महापुरुष का जन्म होगा वो मेरा ही सन्त होगा । तथा वही महापुरुष संसार में शांति लाएंगे तथा उस समय चल रही पाखण्ड पूजा को मिटाकर सतभक्ति लाएंगे यह अटल सत्य हैं।
वह महापुरुष ओर नही स्वम सन्त रामपाल जी महाराज जी है लेकिन दुनिया अभी इस सत्य से परिचित नही है।
यह कितने दुर्भाग्य की बात है की हम कितने पढ़े लिखे हैं फिर भी अपने धर्म ग्रँथों को समझ नही पाते। कारण यह रहा है कि धर्म के ठेकेदार व धर्म के पुजारी इस सत्य से परिचित नही करवाना चाहते हैं
अगर संसार के सभी लोग आज अपने सद्ग्रन्थों को स्वम पढ़ेंगे तो सन्त रामपाल जी महाराज जी के द्वारा बताया गया ज्ञान सत्य मालूम होगा।
सन्त रामपाल जी महाराज जी ने सदग्रन्थोंसे प्रमाणित करके बताये है कि कबीर साहेब जी पूर्ण परमेश्वर है वही सृस्टि के मालिक है वेदो में इसका प्रमाण देखे
पूर्णप्रमात्मा कबीर साहेब जी के साक्षी , सिख धर्म के प्रवर्तक नानक देव जी
इस अथाह ब्रह्मांड में अनेक ग्रहों व उपग्रहों पर काफी अनुसन्धान हो चुका है और हो रहा है। लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान की गुथी अभी तक नही सुलझ पाई थी।
Spiritual knowledge with proof in over all holly book
मनमानी भक्ति साधना अंध श्रद्धा भक्ति हैं
वर्तमान में सही भक्ति बताने वाले सन्त कौन है ?
इस समय कलयुग के बिचली पीढ़ी चल रही है यानी कलयुग का बीच का समय चल रहा है ।
कबीर सागर में एक बहुत बड़ा तथ्य लिखा हुआ है जो बिलकुल सठीक है की जब कलयुग की बिचली पीढ़ी आएगी तब एक महापुरुष का जन्म होगा वो मेरा ही सन्त होगा । तथा वही महापुरुष संसार में शांति लाएंगे तथा उस समय चल रही पाखण्ड पूजा को मिटाकर सतभक्ति लाएंगे यह अटल सत्य हैं।
वह महापुरुष ओर नही स्वम सन्त रामपाल जी महाराज जी है लेकिन दुनिया अभी इस सत्य से परिचित नही है।
यह कितने दुर्भाग्य की बात है की हम कितने पढ़े लिखे हैं फिर भी अपने धर्म ग्रँथों को समझ नही पाते। कारण यह रहा है कि धर्म के ठेकेदार व धर्म के पुजारी इस सत्य से परिचित नही करवाना चाहते हैं
अगर संसार के सभी लोग आज अपने सद्ग्रन्थों को स्वम पढ़ेंगे तो सन्त रामपाल जी महाराज जी के द्वारा बताया गया ज्ञान सत्य मालूम होगा।
पूर्णप्रमात्मा कबीर साहेब जी के साक्षी , सिख धर्म के प्रवर्तक नानक देव जी
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